उत्तराखंड (देहरादून) 8 अप्रैल 2026: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जिलाधिकारी सविन बंसल और अधिवक्ताओं के बीच विवाद लगातार गहराता जा रहा है। हाल ही में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेमचंद शर्मा के खिलाफ जिलाधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई के बाद वकीलों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। इस मुद्दे ने अब बड़ा रूप ले लिया है और बार एसोसिएशन ने इसे आर-पार की लड़ाई घोषित कर दिया है।
दरअसल, 25 मार्च को जिलाधिकारी एवं कलेक्टर न्यायालय में एक मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेमचंद शर्मा ने न्यायालय की कार्यवाही पर कुछ टिप्पणियां की थीं। जिलाधिकारी ने इन टिप्पणियों को अदालत की गरिमा के खिलाफ मानते हुए इसे पेशेवर दुराचार माना और मामले को अनुशासन समिति को भेज दिया। साथ ही जांच के दौरान उनके प्रैक्टिस अधिकारों को निलंबित करने पर भी विचार करने की सिफारिश की गई। जिसके बाद देहरादून बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने बैठक कर घोषणा की है कि जब तक जिलाधिकारी देहरादून का ट्रांसफर नहीं होता, तब तक सभी अधिवक्ता न्यायिक कार्यों का पूर्ण बहिष्कार करेंगे। इसके साथ ही जिलाधिकारी न्यायालय के अलावा राजस्व न्यायालयों और रजिस्ट्रार कार्यालयों में भी कामकाज ठप रखने का निर्णय लिया गया है।
बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि प्रेमचंद शर्मा एक वरिष्ठ और अनुभवी अधिवक्ता हैं, जो सात बार बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं। उनका मानना है कि यदि किसी तरह की टिप्पणी हुई भी थी, तो जिलाधिकारी को पहले इसकी जानकारी बार एसोसिएशन को देनी चाहिए थी, न कि सीधे कार्रवाई करनी चाहिए थी।
प्रेस वार्ता के दौरान बार एसोसिएशन ने प्रशासन पर कई गंभीर आरोप भी लगाए। उनका कहना है कि तहसीलों में दाखिल-खारिज और विरासत जैसे मामलों की फाइलें महीनों से लंबित हैं। इसके अलावा राजस्व न्यायालयों में सुनवाई का कोई निश्चित समय नहीं है, जिससे आम जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वकीलों का आरोप है कि जिलाधिकारी इन समस्याओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।
बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल कुकरेती ने स्पष्ट कहा है कि अगर मंगलवार तक जिलाधिकारी का ट्रांसफर नहीं होता है, तो यह बहिष्कार और व्यापक रूप ले सकता है। उन्होंने इसे आर-पार की लड़ाई बताते हुए संकेत दिए हैं कि आंदोलन लंबा चल सकता है।
देहरादून में जिलाधिकारी और वकीलों के बीच यह विवाद अब गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है। न्यायिक कार्यों के बहिष्कार से आम लोगों पर भी असर पड़ने की संभावना है।
