उत्तराखंड (देहरादून) 8 जुलाई 2025: कई जन संगठनों और विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री को संबोधित खुला खत जारी कर प्रदेश सरकार से मांग की है कि सरकार नफरती प्रचार पर रोक लगाकर जिम्मेदार नेताओं और कर्मचारियों पर कार्यवाई करे। वन अधिकार कानून और मलिन बस्ती अधिनियम पर युद्धस्तर पर कार्यवाही हो। किसी को बेघर न किया जाये और नफरती प्रचारों को ले कर 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर सख्ती से अमल हो। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार अपना ही फर्ज न निभा कर अतिक्रमण के नाम पर लोगों के घरों और दुकानों को हटाने की कोशिश कर रही है।
नफरत नहीं, रोजगार दो के बैनर तले उत्तराखंड लोक वाहिनी अध्यक्ष राजीव लोचन साह, समाजवादी लोक मंच के मुनीश कुमार, ललित उप्रेती, चेतना आंदोलन के विनोद बडोनी, शंकर गोपाल, राजेंद्र शाह, वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के तरुण जोशी, महिला किसान अधिकार मंच की हीरा जंगपांगी, सद्भावना समिति उत्तराखंड के भुवन पाठक, अजय जोशी व शंकर बड़थ्वाल, उत्तराखंड सर्वोदय मंडल के इस्लाम हुसैन, भाकपा के कई जन संगठनों और विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री को खुला खत भेज मांग की
समर भंडारी, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के नरेश नौडियाल, भाकियू एकता के बल्ली सिंह चीमा, अखिल भारतीय नागरिक स्वतंत्रता जनसंगठन के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. नागेंद्र जगूड़ी, एपवा की शिवानी पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी, गीता गैरोला, साहित्यकार राजेश सकलानी, राजेश पाल, उत्तराखंड इंसानियत मंच के राकेश अग्रवाल, त्रिलोचन भट्ट, वन गुज्जर ट्राइबल युवा संगठन के अमानत अली, विजय शंकर शुक्ला, हरबीर सिंह कुशवाहा, सर्वोदय मंडल अल्पसंख्यक सेवा सनिति के मुशर्रफ अली, सामाजिक कार्यकर्ता स्वाति नेगी, स्वतंत्र पत्रकार सत्यनारायण रतूड़ी आदि ने पत्र में कहा है कि वन अधिकार कानून लगभग बीस साल पहले बना था और मजदूर बस्तियों के नियमितीकरण के लिए कानून कांग्रेस सरकार के समय में 2016 में बना था, लेकिन राज्य में दोनों पर अमल ही नहीं हुआ। उल्टा लगातार लोगों को बेघर करने से या खेती या दुकानों को बेदखल करने का प्रयास चल रहा है।
